Thursday, 30 June 2016

नदी और समंदर

वो हज़ारों मील बह कर नदी समंदरों से मिलती है,
उसे लगता है फूल-ए-इश्क़ बस वहीं जा के खिलती है,

अपना बजूद खो कर जब नदी लहरों के संग उठती हैं,
कई नदियां समंदर के छोर पे मिलती हुई दिखती हैं,

इस बेबफाई पे उसे नदियों का संगम याद आता है,
जो समंदर में मिलने तक उसका साथ निभाता है !!!!

Friday, 8 January 2016

तो क्या हुआ ?

वो साल बुरा था.. तो क्या हुआ ?

वो बस 12 महीने का ही तो था !!!!

वो महीना बुरा था.. तो क्या हुआ ?

वो बस चार हफ़्तों का ही तो था !!!!

वो हफ्ता बुरा था.. तो क्या हुआ ?

वो बस सात दिन का ही तो था !!!!


वो दिन बुरा था.. तो क्या हुआ ?

वो बस चौबीस घंटे का ही तो था !!!!

Friday, 16 October 2015

वो इश्क़ के शोले नहीं थे.. बस धुंआ था शायद


वो इश्क़ के शोले नहीं थे.. बस धुंआ था शायद..
तुम बदल गए.. कभी तुम्हे भी प्यार हुआ था शायद,

कभी तुम ही कहती थी.. तुम नहीं होते तोह बहोत याद आते हो...
अब जब मैं आदि हो गया हूँ तेरा तो तुम मुह बनाते हो..
कभी तुम कहती थी.. मैं तुम्हे कभी छोड़ने वाली नहीं..
और अब हमेशा साथ रहने की बात पे कहती हो पता नहीं
मेरा प्यार ही तेरे दिल से कुछ अनछुआ था शायद,
वो इश्क़ के शोले नहीं थे.. बस धुंआ था शायद..
तुम बदल गए.. कभी तुम्हे भी प्यार हुआ था शायद,

कभी तुम ही कहती थी.. तुमसे बात किये बिना सुबह अच्छा नहीं लगता..
और अब तुम्हे मेरा बोला गया कोई लब्ज सच्चा नहीं लगता,
कभी तुम कहती थी.. तुमसे बात करके नींद अच्छी आती है..
और अब तुझसे बात के इन्तेजार में मेरी रात गुजर जाती है..
मैं अच्छा नहीं हमेशा से ही बुरा था शायद..
वो इश्क़ के शोले नहीं थे.. बस धुंआ था शायद..
तुम बदल गए.. कभी तुम्हे भी प्यार हुआ था शायद,

कभी तुम ही कहती थी.. जितना मैं करता हूँ तुम उससे भी ज्यादा मुझसे प्यार करती हो..
और अब तुम्हे मुझसे प्यार है.. ये कहना भी गवारा नहीं करती हो..
कभी तुम कहती थी.. तुमसे हर छोटी छोटी बात बताना अच्छा लगता है,
और अब ना जाने क्यों तुम्हे मुझसे हर बात छुपाना पड़ता है..
हार गया मैं.... कोई बाज़ी-ए-जुआ था शायद..
वो इश्क़ के शोले नहीं थे.. बस धुंआ था शायद..
तुम बदल गए.. कभी तुम्हे भी प्यार हुआ था शायद !!!!

Friday, 15 May 2015

मैं फूल तू बागीचा..

तेरे दिल के बागीचे में
वहीँ पे कहीं हाँ नीचे में

मैं गिर गया
गिर के सूख गया

कोई नया खिला
जिसपे तेरा रुख गया

मैं फूल था
तू ज़मीन-ए-बागीचा

मुझे भी था
तुमने प्यार से सींचा

मेरा नसीब था
गिर के तुझमे खो जाना

तेरे नसीब में फूल ही फूल
एक को छोड़ दूसरे का हो जाना !!!! :|